Thursday, May 26, 2011

ठाढ़ छि



ठाढ़ छि
समयक-शेषनाग बन्हैल छि
सत्य असत्यक बिच
मथनी जँका मथाई छि
मंदराचल जँका
तटस्थ
कच्छप पर 
देवता दिश एक बेर
असुरक दिश एक बेर
खींचल जैत छि
अपने धुरी पर
पृथ्वी जँका
दिन राइत में बंटैल छि

संतुलन आ असंतुलन के खेल


अजब
देहक संरचना अई
मैट पैन बनल
मुदा !
संतुलनेटा में जीवन अई
थोड़बे असंतुलन
पुनः
मैट पैन
अलग भै जैत अई
जीवन जड़ संग बिना
देह ख़त्म भै जैत अई
बड़ा कठिन अई
देहक संतुलन के बनौनाई
देह के बचा रैख पौनाई
हर छन देहक प्रकृति बदलैत छैक
संतुलन असंतुलन के क्रम चलैत छैक
मैट के पैन
पैन के मैट
जुड़नाई बिछरनाई
चलैत रहैत छैक
देहक निर्माण
देहक अबसान
संतुलन असंतुलन के खेल छैक

आनंदक रहस्य



देखलहुं आदमीक स्वभावक स्वरुप
जहन जहन बिपत्ति अबै छैन
मोनक कटुता दूर टै छैन
मीठ बोल सहयोगी बनै छैथ
पुनः
समय अनुकूल होइते
मोन जहर भैर जैत छैन
अजब गजब परिवर्तन
तुरंत तुरंत
एके व्यक्ति के
अलग अलग व्यबहार
समय के अंतराल में
केना रक्त के प्रवाह
बदैल देत छैक
भावनाक स्वरुप के
समझ परे छैक
बुझैत समझैत जनैत
मुदा !
समय  हारैत
व्यक्ति स्वयं
घुटन महशुश करैत छैथ
मुदा !
अभ्यास हावी होइत छैन
अभ्यासक परिहास
मुदा !
सब निर्माण
ईश्वर के कैल छैन
प्रिज्म जँका
भावनाओ के
अलग अलग रूप में
परावर्तित करैक छमता
मनुष्यक ह्रदय में बनौने छैथ
विस्मित करैया
मुदा !
कोनो व्यक्ति विशेष नई
निर्माण कर्ता के निर्माण अई
स्वभावक सच स्वरुप तैं
समझनाई थोड़ेक कठिन अई
तैं
एकरा माईन लेला मात्र
प्रसन्नता सहजे भेटनाईये अई

ओझरैल हमर बौद्धिक मोन


एक अबोध
ह्रदय के शूल
बिना कोनो कारने
अई जन्मक भूल बिना
जहन भोगी रहल अई
दंड पूर्व जन्म के
तहनेटा पता चलैत अई
जन्मांतरक् खेल
ओना सबटा
मिथ्या लगैत अई
विज्ञानक सोच में
ओझरैल हमर बौद्धिक मोन
ईस्वरक लीला मानैक लेल तैयार नै अई
मुदा !
जन्मे  राजा 
जन्मे रंक
जीवन के अनन्त रंग में
ऐना सनैल अई
कि सब किछ माया अई
वर्षाक बुलबुला जँका
रंगीन
मुदा !
फुटलाक बाद
कतौ किछ नै
(आर एम एल हॉस्पिटल में एक बच्चा ह्रदय रोग पीड़ित छल)

Thursday, February 3, 2011

अईंखक दोख आ कि हृदयक….

अईंखक कोन दोख,
जे अहाँक सुन्दरता नई देखलक,
 त देखै टा मात्र छै,
बुझै नई छै,
बिम्ब  प्रतिबिम्बक,
बिच फंसल मात्र एकटा पराबर्तक  छै,
दोस त ह्रदय के छै,
जे भावना शुन्य  छै,
तैं अहाँक सुन्दरताक झीलों में,
मरुभुमिक दग्धातक देखै छै,
ओना जे आन्हरो छैथ,
से कल्पनाक ब्रश ,
सुन्दरताक सृजन हृदयक भाव स करैत छैथ,
मुदा !
जे भाव विहीन छैथ,
अईंख रहितो,
बिम्ब-प्रतिबिम्ब में ओझराइल रहैत छैथ,
अई में हुनको कोनो दोख नई,
जे भाव विहीन छैथ,
यन्त्र बनी बरद  जँका,
जीवनक दाउन में लागल छैथ,
हुनका त आभासों नई छैन,
कि अहू स बिशेष किछ छैई,
मुद्रा-मतलबक डोरी में बन्हैल,
सुखैल बासि खैक आदि,
स्वक्षताक रस  दूर,
जीवनक मकरजाल में,
फंसल छैथ, हेराइल छैथ,  

Thursday, November 25, 2010

सहजता


ज्ञान आ विज्ञान

अनुसंधाने सढ़ै  छै
साहित्यक सृजन,
मंथनेस हो छै
चाहे रूप गढ़ू,
आकि रंग घोरू,

प्रेम करू,
वा नोर बहाऊ,

मोनक उद्वेग,
संयमेस रुकै छै

पीड़ा ह्रदयक,
सहजतेस कमै छै

Monday, November 22, 2010

माँ गई माँ (बाल कविता)


माँ गै माँ,
घरक ऊपर,
चारक तर,
बगरा बनेलकऊ,
एकटा घर

माँ गै माँ,
घरक पाछू,
बारीक बिच,
सुगा अनलकऊ,
एकटा फर

माँ गै माँ,
गामक भीतर,
टोलाक बिच,
नटुआ नचलऊ,
एकटा नाच

माँ गै माँ,
गामक बाहर,
पोखरिक बिच,
पुरैनिक पातपर,
झिलमिल जल

माँ गै माँ,
आँगन कात,
ढेकी लग,
बिहरिमे छौ,
गहुमन साँप

माँ गै माँ,
बस्तुनिया लय,
हम कहलियौ,
सब हाल-चाल,
जल्दीसँ दऽ दहीं,
बस्तुनिया हमर,
हम चललियऊ,
खेलय लेल,
नै देबहीं,
बस्तुनिया हमर

माँ गई माँ,
चिकरैत रहबौ, 
माँ गै माँ,
चिकरैत रहबौ।